लखनऊ। पत्रांक: 272/अधी0अभि0(तक0)/गो0नो0क्षे0/जांच समिति दिनांक: 31.12.2025 के अनुसार 33/11 केवी विद्युत उपकेंद्र – आईआईएम रोड पर कार्यरत संविदा कर्मियों द्वारा कथित अवैध केबल कटिंग के आरोपों की जांच हेतु द्वि-सदस्यीय जांच समिति का गठन उपरांत किसी प्रकार की जांच ना होना… आखिर किस बात का संकेत देता है?
बताते चले कि 24 दिसंबर 2025 को व्हाट्सएप ग्रुप में 11 केवी एंड एलटी–इंदिरानगर क्षेत्र के अंतर्गत 33/11 केवी विद्युत उपकेंद्र–आईआईएम रोड पर कार्यरत कुछ संविदा कर्मियों पर नौबस्ता पुलिया, वासुदेव डिग्री कॉलेज के पास कथित रूप से अवैध केबल काटने के आरोपों की खबर प्रसारित हुई थी।
जिसके उपरांत मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्कालीन अधीक्षण अभियंता (तकनीकी), गोमतीनगर क्षेत्र ने पत्रांक 272, दिनांक 31.12.2025 के माध्यम से दो सदस्यीय जांच समिति गठित की और 03 कार्य दिवस के भीतर स्थलीय निरीक्षण कर सुस्पष्ट जांच आख्या प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि तीन दिन में पूरी होने वाली जांच आज लगभग सात महीने बाद भी अपने अंजाम तक क्यों नहीं पहुंची?
इस बीच जांच के आदेश देने वाले अधीक्षण अभियंता (तकनीकी) का स्थानांतरण हो गया, नए अधिकारी ने कार्यभार भी संभाल लिया, लेकिन जांच फाइल आज भी आगे नहीं बढ़ी।
*अब उठ रहे हैं बड़े सवाल…*
👉🏽 क्या जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट समय पर दी थी?
👉🏽 यदि रिपोर्ट दी गई, तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?
👉🏽 यदि रिपोर्ट नहीं दी गई, तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
👉🏽 क्या जांच को जानबूझकर लंबित रखा गया?
👉🏽 क्या किसी कर्मचारी या अधिकारी को बचाने का प्रयास किया जा रहा है?
यदि विभागीय आदेशों में निर्धारित 03 कार्य दिवस की समय-सीमा का पालन ही नहीं होगा, तो फिर ऐसे आदेशों का महत्व क्या रह जाता है?
अब आवश्यकता है कि विभाग इस मामले में स्थिति स्पष्ट करे और यदि जांच में अनावश्यक विलंब हुआ है, तो मूल प्रकरण के साथ-साथ जांच लंबित रखने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाए।
🗣️ *आपकी क्या राय है?*
क्या सात महीने तक जांच लंबित रहना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है, या इससे जांच की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं?
*कमेंट में अपनी व्यक्तिगत राय अवश्य दें।*