सुपुर्दे खाक हुए मरहूम आलम बदी साहब चाहने वालों ने नम आँखों से की अंतिम विदाई

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कुछ लोग सियासत में सिर्फ़ नाम व शोहरत हासिल नहीं करते, बल्कि अपने पीछे एक पूरी दास्तान छोड़ जाते हैं। उनके जाने के बाद सिर्फ़ एक शख़्सियत का इंतिक़ाल नहीं होता, बल्कि अवाम का एक भरोसा, पार्टी का एक मज़बूत कारकुन और सियासत का एक ख़ुलूस भरा बाब हमेशा के लिए बंद हो जाता है।
इसी के एक कड़ी थे समाजवादी पार्टी के बुज़ुर्ग और सीनियर लीडर व कई बार के विधायक(विधानसभा निज़ामाबाद आज़मगढ़) जनाब आलम बदी साहब जिनके इंतिक़ाल की ख़बर ने दिल को बेहद मग़मूम कर दिया।
आज उनके वतन आजमगढ़ जाकर मरहूम आलम बदी साहब की नमाज़-ए-जनाज़ा व तदफीन में शिरकत की और उनके अहले-ख़ाना से मुलाक़ात कर इस दुख की घड़ी में ताज़ियत पेश की।मरहूम आलम बदी साहब समाजवादी नज़रिये के उन सच्चे और मज़बूत कारकुनो में से थे, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी अवाम की ख़िदमत, मज़लूमों की आवाज़ और समाजवादी उसूलों की पासदारी में गुज़ार दी। उनकी सियासी ज़िन्दगी सिर्फ़ चुनाव जीतने और ओहदे हासिल करने तक महदूद नहीं थी, बल्कि वह अवाम के दुख-दर्द में शरीक रहने वाले, अवाम के हक़ की आवाज़ बनने वाले और समाजवादी तहरीक के सच्चे ख़ादिम थे।
उनका इंतिक़ाल समाजवादी पार्टी और ख़ास तौर पर आज़मगढ़ की सियासत के लिए एक ऐसा नुक़सान है, जिसकी भरपाई शायद कभी मुमकिन न हो सके। उनकी ख़िदमात, उनकी सादगी, उनका ख़ुलूस और अवाम से उनका गहरा रिश्ता हमेशा लोगों के दिलों में ज़िन्दा रहेगा।
अल्लाह तआला मरहूम आलम बदी साहब की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी क़ब्र को नूर से मुनव्वर करे, उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए और उनके तमाम अहले-ख़ाना,अज़ीज़-व-अक़ारिबदोस्तों और चाहने वालों को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।
आमीन सुम्मा आमीन

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