बुद्ध विहार शांति उपवन में प्रथम धम्मचक्क पव्वत्तन कार्यक्रम सम्पन्न

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लखनऊ।
भगवान बुद्ध ने प्रथम बार अपने पांच भिक्खुओं को उपदेश अपने पांच भिक्खुओं को इसिपत्तन मिगदाव सारनाथ में असाढ़ी पूण्णिमा को ईसवी पूर्व 528 में दिया था। उन भिक्खुओं ने गोतम बुद्ध को अपना गुरु माना था। इसके बाद निरन्तर उनके अनुयाई बनते गये और कालान्तर में बौद्ध समाज बना। इसी दिन बौद्ध धर्म का स्थापना दिवस माना जाता है। इस यादगार में आज आषाढ़ी पूर्णिमा को बौद्ध विहार शान्ति उपवन, एल०डी०ए० कालोनी, कानपुर रोड लखनऊ में प्रार्थना सभा सम्पन्न हुई। इस अवसर पर तिसरण, पंचसील एवं तिरत्न वन्दना के साथ प्रथम धम्मचक्क पव्वत्तन सुत्त का लयवद्ध संगायन पालिभाषा में किया गया। इसके बाद हिन्दी में अर्थ बताया गया। बुद्ध के उपदेश के अधीन धम्म, अधम्म एवं सद्धम्म को बताया गया।

यह आयोजन भिक्खुनी धम्म मेघा सावत्थी एवं भन्ते कोसल बोधि लखनऊ एवं आचरियो दया सागर बौद्ध, आचरियो हरीलाल बौद्ध के संयोजन में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर दया सागर बौद्ध, हरीलाल बौद्ध, सुरेन्द्र सिंह वरुण, कालिका प्रसाद बौद्ध, सच्चेलाल गौतम, सिरी निवास मडाले बौद्ध, ब्रम्हादीन गोतम, जिया लाल बौद्ध एवं राज्जसेखर बौद्ध प्राचीन वप्पमंगल बौद्ध परम्परा के अधीन सिर के बाल, दाढ़ी एवं मूछ मुड़वाये।

इस कार्यक्रम में डा० जयवन्त खण्डारे प्रवक्ता, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय गोमती नगर लखनऊ ने प्रथम धम्मचक्क पव्वत्तन एवं भगवान बुद्ध के प्रथम धम्म उपदेश के महत्व को समझाया कि भारत विश्व गुरु भगवान बुद्ध के कल्याणकारी उपदेशों के कारण है। जिन देशों ने बुद्ध को अपनाया वे सम्पन्न देश है। इसके लिए उन्होंने पालिभाषा पढ़ने पर नवयुवकों को प्रोत्साहित किया। इससे चरित्र निर्माण को बल मिलेगा और समाज में अनाचार रुकेगा।

इस कार्यक्रम में आयु० सी०एल० गोतम, समय सिंह गौतम, अमर नाथ,देव नारायन बौद्ध, आर० सी० बौद्ध, शान्ति देवी, रेखा छागला एवं बुद्ध विहार स्टाफ का विशेष सहयोग रहा। अन्त में भिक्खुओं एवं अन्य सभी सहभागियों को भोजन दान दिया गया और प्राणी कल्याण गाथा के साथ इस प्रार्थना सभा का समापन किया गया। इसका आयोजन व्यय पालिभाषा एवं बौद्ध संस्कृति विकास समिति उत्तर प्रदेश द्वारा किया गया।

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