*प्रो. रफ़ीउल्लाह आज़मी विभागाध्यक्ष इतिहास विभाग, मौलाना आजाद नेशनल उर्दू विश्वविद्यालय हैदराबाद का शिब्ली नेशनल कॉलेज के छात्रों के साथ भारत-मध्य पूर्व संबंधों पर गहन चर्चा:*

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आजमगढ़ से संवाददाता अब्दुर्रहीम शेख़।

आजमगढ़, 15 अप्रैल 2025: शिब्ली नेशनल कॉलेज के इतिहास विभाग द्वारा आयोजित वार्षिक व्याख्यानमाला के अंतर्गत मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद के इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रो. रफीउल्लाह खान आज़मी ने “भारत के मध्य पूर्व देशों से संबंध: ऐतिहासिक परिदृश्य और वर्तमान परिदृश्य” विषय पर एक प्रेरक और विद्वतापूर्ण व्याख्यान प्रस्तुत किया। अपने प्रभावशाली संबोधन में उन्होंने भारत और मध्य पूर्व देशों के बीच प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों का विस्तृत और गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया।
प्रो. रफीउल्लाह खान आज़मी ने प्राचीन समुद्री व्यापार के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, “प्राचीन काल में भारत के मालाबार, गुजरात और कोंकण तटों से अरब सागर के रास्ते मसाले, रेशम, सोना और अन्य कीमती वस्तुओं का व्यापार होता था। यह व्यापार केवल आर्थिक लेन-देन तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने भारत और अरब के बीच सांस्कृतिक, भाषाई और बौद्धिक सेतु का निर्माण किया। भारत के बंदरगाहों पर अरब व्यापारियों का आगमन न केवल व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा देता था, बल्कि कला, साहित्य और दर्शन के आदान-प्रदान को भी प्रोत्साहित करता था।” उन्होंने आधुनिक संदर्भ में इन संबंधों की प्रासंगिकता पर जोर देते हुए कहा, “आज भारत और मध्य पूर्व के बीच ऊर्जा सुरक्षा, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और भू-राजनीतिक सहयोग के क्षेत्र में गहरा जुड़ाव है। मध्य पूर्व के साथ भारत का यह रिश्ता वैश्विक स्थिरता, आर्थिक समृद्धि और सांस्कृतिक एकता के लिए महत्वपूर्ण है। दोनों क्षेत्रों के बीच सहयोग न केवल द्विपक्षीय हितों को बढ़ावा देता है, बल्कि जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद और व्यापार जैसे वैश्विक मुद्दों से निपटने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।”
प्रो. रफीउल्लाह खान आज़मी ने अंतिम वर्ष के छात्रों से चर्चा में इस विषय के भविष्य में उपयोग पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “भारत-मध्य पूर्व संबंधों का अध्ययन इतिहास के छात्रों के लिए कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय संबंध और सांस्कृतिक मध्यस्थता जैसे क्षेत्रों में करियर के अवसर खोलता है। अरबी भाषा और क्षेत्रीय इतिहास पर ध्यान देकर आप शोध, नीति निर्माण या पत्रकारिता में विशेषज्ञता हासिल कर सकते हैं।”
अरबी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. मोहिउद्दीन आज़ाद इस्लाही ने अपने संक्षिप्त वक्तव्य में कहा, “अरब और हिंदुस्तान के बीच सांस्कृतिक और व्यापारिक रिश्ते सदियों पुराने हैं। यह संबंध आज भी शिक्षा और व्यापार में मजबूती से कायम है।”
कार्यक्रम की अध्यक्षता इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रो. अलाउद्दीन खां ने की। उन्होंने प्रो. रफीउल्लाह खान आज़मी के व्याख्यान की सराहना करते हुए कहा, “यह व्याख्यान छात्रों के लिए भारत के वैश्विक संबंधों को ऐतिहासिक और समकालीन दृष्टिकोण से समझने का एक अनमोल अवसर प्रदान करता है।” कार्यक्रम का संचालन एम.ए. अंतिम वर्ष की छात्रा सबा परवीन ने अत्यंत कुशलता और आत्मविश्वास के साथ किया।
इस अवसर पर इतिहास विभाग के प्राध्यापक डॉ. सिद्धार्थ सिंह, डॉ. तबरेज़ आलम, डॉ. शहरयार, राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. शफीउज़्ज़मां, दिव्यशक्ति कुमार गौतम एवं इतिहास विभाग के एम.ए. के समस्त छात्र-छात्राओं की उपस्थिति सराहनीय रही । छात्रों ने व्याख्यान में उत्साहपूर्वक भाग लिया और सवाल-जवाब सत्र में विषय से संबंधित गहन प्रश्नों के माध्यम से अपनी जिज्ञासा व्यक्त की। आभार ज्ञापन डॉ. शकीम ने किया।
यह व्याख्यान न केवल छात्रों के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक रहा, बल्कि भारत और मध्य पूर्व के बीच साझा इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और भविष्य की संभावनाओं को समझने में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।

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