वाराणसी। उत्तर प्रदेश किसान सभा ने मंगलवार को जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचकर सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ तीखा विरोध जताया। बड़ीसंख्या में किसानों ने एकजुट होकर ज्ञापन सौंपा और केंद्र सरकार पर किसानों की बदहाली को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया।
मीडिया से बातचीत में किसान सभा के नेताओं ने कहा कि सरकार की नीतियों ने खेती को घाटे का धंधा बना दिया है। उन्होंने 2020 में लाए गए तीन किसान विरोधी कानूनों—(1) आवश्यक वस्तु (संशोधन) नियम, (2) कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) और (3) कृषक (सशक्तीकरण एवं संरक्षण) मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवा—का जिक्र करते हुए कहा कि 750 किसानों की शहादत के बाद सरकार को इन्हें वापस लेना पड़ा। लेकिन अब, 25 नवंबर 2024 को केंद्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा जारी “कृषि विपणन” डेटा में 10 साल में 5.23% की कृषि वृद्धि का दावा किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है।
किसान सभा ने इस आंकड़े को फर्जी करार देते हुए कहा कि जमीनी हकीकत में किसान कर्ज और नुकसान के दलदल में डूब रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अप्रत्यक्ष रूप से उन तीनों कानूनों को फिर से लागू करने की साजिश रच रही है।
मांगों में फसलों को नुकसान से बचाने, अरहर, मटर, मक्का जैसी खेती को बढ़ावा देने, बैल और गायों से फसलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और वास्तविक कृषि डेटा जारी करने की बात शामिल थी। किसान सभा ने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने मांगें नहीं मानीं, तो वाराणसी से शुरू हुआ यह आंदोलन पूरे प्रदेश में आग की तरह फैलेगा। क्या सरकार किसानों की पुकार सुनेगी, या यह विरोध और उग्र होगा? यह समय बताएगा।