असली चारा चोर की कहानी : ब्राह्मणवाद क्या है, जिससे हम और पूरा भारतीय समाज लड़-जूझ रहा है?

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ब्राह्मणवाद वो सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था है, वो नेक्सस है, वो आंतरिक जातीय खेमेबंदी है, वो फेनोमेना है – जो एक पिछड़े नेता को गुनहगार और ब्राह्मण नेता को बेगुनाह बना बनाने की क्षमता रखता है।

बिहार का चारा घोटाला, जिसमें लालू यादव को सजा कराई गई, और जगन्नाथ मिश्रा जैसे ब्राह्मण मुख्यमंत्री को बचा लिया गया, वो इस ब्राह्मणवाद के फेनोमेना को समझने-समझाने के लिए सबसे ज्वलंत उदाहरण है, जो गांव की गलियों से लेकर ब्यूरोक्रेसी, जुडिशरी और पॉलिटिक्स में व्याप्त है।

चारा घोटाला 1996 में लालू यादव के सीएम रहते उजागर हुआ। लेकिन ये चारा घोटाला असल में 1970ई० से ही बिहार के पशुपालन विभाग में सिस्टमैटिक ढंग से व्याप्त था। इस घोटाले की नींव जगन्नाथ मिश्र जैसे ब्राह्मण मुख्यमंत्रियों के शासनकाल में 1975 से ही रखी जा चुकी थी, जिसमें बिहार के पशुपालन विभाग के अफसर बेहद ऑर्गनाइज्ड तरीके से शामिल थे।

लालू जी 1990 में मुख्यमंत्री बने। और ये घोटाला, उनकी सरकार बनने से कई साल पहले से ही सिस्टम में मौजूद था। जगन्नाथ मिश्रा के टाइम से शुरू हुई नकली बिलों, दिखावटी परिवहन-यंत्र और मनमाने दामों की जो कार्यप्रणाली थी, वह पशुपालन विभाग और बाकी ब्यूरोक्रेसी में पहले से ही पूरी तरह से स्थापित और सुसंगठित हो चुकी थी।

इस अपराध में शामिल अफसर और अपराधियों का नेटवर्क और उनकी जड़ें, बिहार में मजबूत हो चुकी थीं।

लालू यादव को ऐसे मामले में सजा जरूर करा दी गई, लेकिन CBI या अदालत, यह कभी साबित नहीं कर पाए कि लालू यादव को घोटाले से कोई पैसा मिला है।
उन्हें सज़ा सिर्फ इस आधार पर मिली कि वो मुख्यमंत्री थे, और उन्हें पता होना चाहिए था!

ब्राह्मणवादी ताकतों द्वारा बड़ी चालाकी से यह तर्क दिया गया कि अगर किसी भी विभाग में गड़बड़ी चल रही थी, तो CM की चूक है।
और इस तरह, लालू जी को ‘विचारशील उत्तरदायित्व’ यानि ‘विकैरियस लायाबिलिटी’ के आधार पर दोषी ठहराया गया, न कि सीधी संलिप्तता से!

लेकिन प्रशासनिक लापरवाही का मतलब ये तो नहीं होता कि व्यक्ति ने खुद घोटाला किया है?
इस आधार पर तो देश के सारे मुख्यमंत्रियों-प्रधानमंत्रियों को जेल में होना चाहिए!
सिर्फ लालू को जेल क्यों?
वो भी इस लॉजिक के साथ कि आपके रिजीम में करप्शन हो रहा था, और आप ध्यान नहीं दिए।

यह घोटाला मुख्यतः पशुपालन विभाग के भीतर चलता था, खासकर ज़िला स्तर पर। नकली बिल, फर्जी सप्लाई, बिना किसी खरीदी के भुगतान – ये सारे काम, विभाग के छोटे अफ़सरों और सप्लायर्स और उनके नेटवर्क द्वारा किया-कराया जाता था। मुख्यमंत्री का इतने छोटी स्तर पर हो रही आर्थिक मंजूरियों से सीधा कोई लेना-देना नहीं होता!

और यदि लालू यादव जैसे जनवादी नेता को इस बात के लिए जेल हो सकती है कि उनके कार्यकाल में चल रहे भ्रष्टाचार पर निगाह क्यों नहीं पड़ी, फिर तो देश के सभी नेताओं को जेल में होना चाहिए!
सिर्फ लालू यादव को सजा क्यों?

तो कुल मिलाकर ब्राह्मणवाद यही है कि एक अपराध, एक घोटाला जिसका शिल्पकार बाभन जगन्नाथ मिश्रा था, उसे उसके अपराध की कोई सजा नहीं मिली। और पिछड़े समाज से आने वाले लालू यादव को इस ब्राह्मणवादी व्यवस्था द्वारा जेल में डाल दिया गया।

ये संविधान के आर्टिकल 14 का घोर उल्लंघन है, जो हमें कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है।

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