*भौवापार स्थित मुंजेश्वरनाथ शिव मंदिर अपनी प्राचीनता, पवित्रता व महात्म्य के लिए शताब्दियों से प्रसिद्ध है। इस शिव मंदिर का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। “नागकौशलोत्तर” नामक ऐतिहासिक ग्रंथ के अनुसार मुंजेश्वरनाथ नाथ मंदिर की स्थापना सतासी नरेश राजा मुंज ने किया था। उक्त मंदिर की स्थापना के विषय में अनेक किंवदंतियां प्रचलित है। जनश्रुतियों के मुताबिक खेत जोतते समय मजदूरों के फावड़े से ज्योंहि एक पत्थर पर चोट लगी, उस पत्थर से दूध की धारा बहने लगी। सतासी नरेश राजा मुंज ने उसे मूर्ति को अन्यत्र ले जाने का प्रयास किया , परंतु वे सफल नहीं हुए । दूसरे दिन स्वप्न में भगवान शंकर ने कहा, “मेरे लिए मंदिर और जलाशय बनवा दो तथा पुजारियों के लिये अगल-बगल की जमीन जीविकोपार्जन के लिए दे दो। मैं यहीं निवास करूंगा। स्वप्न के अनुसार राजा मुंज ने ऐसा ही किया। इसी से मुंज के नाम पर कालान्तर में इस मंदिर का नाम मुंजेश्वरनाथ मंदिर हुआ।*
*मुंजेश्वरनाथ (भौवापार), दुग्धेश्वरनाथ (देवरिया), तामेश्वरनाथ (सन्तकबीर नगर), भदेश्वर नाथ (बस्ती), नागेश्वर नाथ (अयोध्या ) आदि शिव मंदिर पंचनाथो की परंपरा में भौवापार का मुंजेश्वर नाथ मंदिर प्रतिष्ठित और प्रमुख स्थान रखता है।*
*मुंजेश्वर नाथ मंदिर के निर्माण में पुरातत्व, वास्तुकला और मूर्तिकला के प्रतीकों की स्पष्ट छाप है। देवस्थान के इसी प्राकृतिक और रम्य स्वरूप को देखकर प्रोफ़ेसर इरिक स्ट्राक मोहित हो उठे थे। जनवरी, 1972 में कैंब्रिज यूनिवर्सिटी, लंदन से आए प्रख्यात पुरातत्ववेत्ता प्रोफ़ेसर इरिक स्ट्राक ने इस मंदिर के लौकिक स्वरूप पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि “भारत अलौकिक देश है, तथा उसके महादेव भी अलौकिक हैं, जहां नदी है, गणेश वहीं शिव भी है ।*”
*प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि, दशहरा, मलमास, एवं सावन महीने में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है। महाशिवरात्रि के अवसर पर तो दूर-दूर से लाखों श्रद्धालु यहां जलाभिषेक के लिये आते हैं।*
*मंदिर के सामने विशाल जलाशय है । मंदिर परिसर में भगवान राम, लक्ष्मण, सीता एवं हनुमान जी सहित कई , अन्य देवी- देवताओं के एक दर्जन से अधिक छोटे-बड़े मंदिर स्थित हैं। यहां हमेशा मुंण्डन संस्कार, यज्ञोपवीत एवं विवाह आदि कार्यक्रम होते रहते हैं।*