वाराणसी में प्रतिमाओं का विसर्जन, भक्तों ने मां को दी विदाई, संकुलधारा पोखरे पर उमड़ी भीड़

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वाराणसी। शारदीय नवरात्र के समापन के साथ ही काशी में मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन प्रारंभ हो गया है। नगर निगम की ओर से शहर के विभिन्न कुंडों, तालाबों और कृत्रिम तालाबों में कुल लगभग 240 प्रतिमाओं के विसर्जन की व्यवस्था की गई थी। गुरुवार को विसर्जन की शुरुआत हुई, लेकिन धार्मिक परंपराओं और गुरुवार के दिन विसर्जन न करने की मान्यता के कारण अपेक्षाकृत कम संख्या में ही प्रतिमाओं का विसर्जन हुआ। शुक्रवार को माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो गया और बड़ी संख्या में प्रतिमाओं का धूमधाम से विसर्जन किया गया।

शहर के संकुलधारा पोखरे पर भी शुक्रवार को प्रतिमाओं का विसर्जन बड़े ही उत्साह और श्रद्धा के साथ किया गया। पांडे हवेली के लोग भारी बारिश के बीच मां दुर्गा, भगवान गणेश, लक्ष्मी, सरस्वती और भगवान कार्तिक की प्रतिमाएं लेकर पहुंचे और परंपरागत रीति-रिवाज से उनका विसर्जन किया। इस दौरान भक्तों ने ढोल-नगाड़ों की थाप पर जमकर नृत्य किया। महिलाएं भी बड़ी संख्या में शामिल हुईं और मां से प्रार्थना करती रहीं कि वह अगले वर्ष शीघ्र आएं और उनका आशीर्वाद प्रदान करें।

बंगाली परंपरा का निर्वहन
स्थानीय गणेश चक्रवर्ती ने बताया कि बंगाल की परंपरा में गुरुवार को प्रतिमाओं का विसर्जन नहीं किया जाता है। इसी कारण उनके समुदाय ने शुक्रवार को विशेष उत्साह के साथ प्रतिमाओं का विसर्जन किया। लोग नाचते-गाते हुए पोखरे पर पहुंचे और मां को भावभीनी विदाई दी।

प्रशासन की सतर्कता और सराहनीय पहल
नगर निगम ने इस वर्ष विशेष व्यवस्था की है। विसर्जन के दौरान प्रतिमाओं को तालाब और कुंड से निकालकर एक किनारे रखा जा रहा है ताकि पानी अधिक प्रदूषित न हो। नगर आयुक्त अक्षत वर्मा ने बताया कि आठों जोन की लगभग 240 प्रतिमाओं का विसर्जन शहर के 20 कुंडों और तालाबों में किया जा रहा है। भेलूपुर पुलिस और एनडीआरएफ की टीम सुरक्षा और आपातकालीन व्यवस्था के लिए मौके पर मौजूद रही।

पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा संकुलधारा पोखरा
संकुलधारा स्थित प्राचीन श्री द्वारकाधीश मंदिर के महंत स्वामी रामदास आचार्य ने बताया कि यह पोखरा बेहद पौराणिक है और इससे कई धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। उन्होंने प्रशासन की व्यवस्था की सराहना करते हुए कहा कि प्रतिमाओं को विसर्जन के बाद तुरंत निकाल लेने का कार्य अत्यंत प्रशंसनीय है, क्योंकि इससे पर्यावरण संरक्षण और जल स्वच्छता दोनों सुनिश्चित हो रहे हैं।

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