संग्रामपुर। ग्रामसभा ठेंगहा में जारी श्रीमद् भागवत कथा सप्ताह के दूसरे दिन आत्मदेव ब्राह्मण और धुंधकारी की हृदयस्पर्शी कथा ने श्रद्धालुओं के मन को गहराई से स्पर्श किया। कथावाचक शिव शंकर त्रिपाठी जी महाराज ने पाप, मोह, भ्रम और पश्चाताप से जुड़े प्रसंग को अत्यंत प्रभावी शैली में प्रस्तुत कर पंडाल में बैठे श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।
कथा में वर्णित हुआ कि धर्मनिष्ठ आत्मदेव ब्राह्मण संतान की इच्छा के कारण छल का शिकार हो गए। साध्वी के छल से जन्मे धुंधकारी की उद्दंड प्रवृत्तियों के चलते परिवार में कलह बढ़ गया और माता-पिता गहरे दुख में डूब गए। घर की अशांति से व्यथित आत्मदेव अंततः तपस्या के लिए वन को प्रस्थान कर गए। वहीं लोभ और अधर्म में डूबा धुंधकारी पापमय जीवन के कारण प्रेत योनि में भटकने को विवश हुआ।
कथावाचक ने बताया कि उसके सौतेले भाई गोकर्ण, जो धर्मपरायण और विद्वान थे, ने धुंधकारी के उद्धार हेतु भागवत कथा का आयोजन कर मोक्ष दिलाने का संकल्प लिया। कथा श्रवण के पुण्य प्रभाव से धुंधकारी की आत्मा का उद्धार हुआ और दिव्य पुष्प वर्षा के साथ उसकी मुक्ति की घोषणा हुई। इस क्षण को सुनकर पूरा कथा पंडाल भक्ति और भावनाओं से भर उठा।
शिव शंकर त्रिपाठी जी महाराज ने संदेश दिया कि पाप का परिणाम सदैव दुख होता है, जबकि सत्संग, भक्ति और ज्ञान मनुष्य को दिव्यता की ओर ले जाते हैं। बुरी संगति मनुष्य का पतन करती है और सच्चा ज्ञान मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
कार्यक्रम में जगदीश नारायण अग्रहरि, हुकुम चन्द्र, यज्ञ नारायण तिवारी, रघुनाथ पाण्डेय, लक्ष्मी कांत, पुष्पराज सिंह, गायत्री प्रसाद, राम लखन, बजरंग प्रसाद, चित्रकूट मणि, राधेश्याम तिवारी, महादेव बरनवाल समेत अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे। भारी संख्या में महिलाएँ भी कथा में पहुँची और रसपान कर भक्ति में लीन रहीं। भजन-कीर्तन और शंखध्वनि से सम्पूर्ण वातावरण भक्तिमय बना रहा।